मौण मेला: नदी में पहले डाला जाता है पाउडर फिर पकड़ते हैं मछलियों को, उत्तराखंड का मेला ऐसा भी जानिए... - Pahadi Khabarnama पहाड़ी खबरनामा
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मौण मेला: नदी में पहले डाला जाता है पाउडर फिर पकड़ते हैं मछलियों को, उत्तराखंड का मेला ऐसा भी जानिए…

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मौण मेला: नदी में पहले डाला जाता है पाउडर फिर पकड़ते हैं मछलियों को, उत्तराखंड का मेला ऐसा भी जानिए…

मौण मेला:  उत्तराखंड के जौनपुर में “राजा” जादू ले मोण के रानी जाड़े ना ले देदी” राजशाही के जमाने से चला आ रहा मोण मेला जौनपुर मे बहुत लोकप्रिय है।  मछली पकड़ने हेतु आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी का इस्तेमाल किया जाता है जैसे अखरोट टीमरू और जौनपुर मे मोण को त्योहार के रूप मे मनाते है। दो साल बाद आयोजित जौनपुर का ऐतिहासिक राज मौण मेला रविवार को धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान अगलाड नदी में टिमरू पाउडर डालकर मछलियों को बेहोश किया गया फिर हजारों लोग नदी में कूद पड़े और मछलियां पकड़ी। इस मौके पर ढोल नगाड़ों की थाप पर ग्रामीणों ने लोकनृत्य किया।

मेले में जौनपुर, जौनसार, रंवाई घाटी समेत आसपास के क्षेत्र के 20 हजार से अधिक लोगों ने शिरकत की। लोग सुबह से ही नदी के पास पहुंचने शुरू हो गए थे। नदी में पहुंचने पर ढोल नगाड़ों के साथ ग्रामीणों ने लोक गीतों संग पारंपरिक लोक नृत्य किया। इस दौरान नदी में एक साथ आठ क्विंटल से अधिक टिमरू पाउडर डाला फिर जाल लेकर नदी में मछली पकड़ने के लिए कूद पड़े। प्रदीप कवि ने बताया कि अबकी नैनबाग क्षेत्र के करीब 16 गांवों के लोगों ने करीब दो से तीन सप्ताह में टिमरू पाउडर को बनाया। मेला कोरोना काल 2020 और 2021 में आयोजित नहीं हुआ था। कहा कि दो साल बाद आयोजित हुए मेले को लेकर ग्रामीणों में उत्साह और खुशी है।

मौण मेला समिति अध्यक्ष महिपाल सिंह सजवाण ने बताया कि क्षेत्र के लोग प्राचीन काल से मेले को मनाते आ रहे हैं। कहा कि 156 साल से परंपरा लगातार चल रही है। सिया चौहान ने बताया कि मेला क्षेत्र का पारंपरिक मेला है। कुछ लोग नदी में ब्लीचिंग पाउडर डालकर मछली का अवैध पातन कर रहे हैं, इस पर रोक लगनी चाहिए। कहा कि आने वाले समय में जागरुकता अभियान चलाएंगे कि लोग नदी में ब्लीचिंग पाउडर न डाले। मौण मेला 1866 में तत्कालीन टिहरी नरेश ने शुरू कराया था। उस समय से लगातार मेला आयोजित किया जाता है।

पाउडर बनाने के लिए एक माह से शुरू होती तैयारी
जिस टिमरू पाउडर को ग्रामीण मछली पकड़ने के लिए नदी में डालते हैं, उसको बनाने के लिए गांव के लोग एक माह पूर्व से तैयारी में जुट जाते है। प्राकृतिक जड़ी बूटी और औषधीय गुणों से भरपूर टिमरू के पौधे की तने की छाल को ग्रामीण निकालकर सुखाते हैं फिर छाल को ओखली या घराट में बारीक पीसकर पाउडर तैयार करते हैं। टिमरू पाउडर के नदी में पड़ने के बाद कुछ देर के लिए मछलियां बेहोश हो जाती हैं। पाउडर से मछलियां मरती नही हैं।

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