उत्तराखंड
घनसाली: भाजपा के मंच पर ‘मसाण’ का जिक्र, अपने ही संगठन को लेकर वरिष्ठ नेता की टिप्पणी चर्चा में…
घनसाली। घनसाली में भाजपा के कार्यक्रम में एक ओर जहां घनसाली जन संघर्ष मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष संदीप आर्य के भाजपा में शामिल होने को संगठन के विस्तार और राजनीतिक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम के तौर पर देखा गया, वहीं इसी कार्यक्रम में मंच से वरिष्ठ भाजपा नेता रजनीकांत सुरीरा की ओर से संगठन के संदर्भ में ‘मसाण’ शब्द का इस्तेमाल चर्चा का केंद्र बन गया।
कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष एवं टिहरी जिला प्रभारी अनिल गोयल, स्थानीय विधायक शक्तिलाल शाह, भाजपा जिलाध्यक्ष उदय रावत समेत पार्टी के कई वरिष्ठ पदाधिकारी, जनप्रतिनिधि और कार्यकर्ता मौजूद थे। इसी मंच से संदीप आर्य ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में विश्वास जताया।
लेकिन कार्यक्रम का राजनीतिक संदेश उस वक्त कुछ अलग दिशा में मुड़ गया, जब वरिष्ठ नेता रजनीकांत सुरीरा ने अपने संबोधन में संगठन को लेकर ‘मसाण’ से जुड़ी टिप्पणी कर दी। अपने ही दल के सार्वजनिक मंच पर संगठन के संदर्भ में इस तरह की प्रतीकात्मक उपमा सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू होना स्वाभाविक है।
सामान्य तौर पर राजनीतिक मंच संगठन की मजबूती, विचारधारा, उपलब्धियों और भविष्य की रणनीति का संदेश देने के लिए होते हैं। ऐसे में उसी मंच से अपने संगठन के संदर्भ में ‘मसाण’ जैसे शब्द का इस्तेमाल कई सवाल छोड़ गया। टिप्पणी का वास्तविक आशय क्या था, यह उसके पूरे संदर्भ से ही स्पष्ट हो सकता है, लेकिन सार्वजनिक मंच पर बोले गए शब्द अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन चुके हैं।
विडंबना यह भी है कि जिस कार्यक्रम में भाजपा अपने संगठन के विस्तार का संदेश दे रही थी, उसी मंच से निकली एक टिप्पणी ने संगठन के भीतर की तस्वीर को लेकर अलग बहस छेड़ दी। संदीप आर्य के भाजपा में शामिल होने से जहां पार्टी के बढ़ते दायरे की चर्चा होनी थी, वहीं ‘मसाण’ वाली टिप्पणी ने पूरे कार्यक्रम की सुर्खियों का एक हिस्सा अपने नाम कर लिया।
अब स्थानीय राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि आखिर संगठन के संदर्भ में ‘मसाण’ शब्द का इस्तेमाल किस अर्थ में किया गया। यदि यह महज स्थानीय मुहावरे या भाषण का हिस्सा था तो उसका संदर्भ क्या था और यदि इसके पीछे कोई राजनीतिक संकेत था तो वह किस ओर इशारा करता है—इन सवालों का जवाब स्वयं बयान देने वाले नेता ही बेहतर तरीके से दे सकते हैं।
फिलहाल इतना जरूर है कि संदीप आर्य के भाजपा में शामिल होने से शुरू हुआ कार्यक्रम संगठन के विस्तार के संदेश के साथ खत्म होने के बजाय ‘मसाण’ वाली टिप्पणी के कारण एक अलग राजनीतिक बहस छोड़ गया है। राजनीतिक मंच पर शब्दों का चयन कितना महत्वपूर्ण होता है, घनसाली का यह प्रसंग इसका एक दिलचस्प उदाहरण बन गया है।

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